चली ग्यी छोड क मन्नॆ मेरी कलम के साथ

कसुती मासुम थी वा
जिसकॆ स्यामी बॆठ लिखना सीखा था
बडी अजीब थी उसकी हास्सी
जिसके स्यामी हर पकवान फीका था
फेर तन्हा करग्यी जो थामा था उसने मेरा हाथ
बहोत दुर चली ग्यी छोड क मन्नॆ मेरी कलम के साथ ।

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